Tuesday, January 5, 2016

Gunaah !

वो रात और थी जब बेपरवाह थी जन्नत ,
नूर-ओ-सहर भी अब शम्मा की पनाह मांगती है ,
सर्द पड़ी हुई हैं उम्मीद की हड्डियाँ आज,
कि रब की बंदगी  भी अब गुनाह मांगती है !


-copyright belongs to Satbir Singh

No comments:

Post a Comment