वो रात और थी जब बेपरवाह थी जन्नत ,
नूर-ओ-सहर भी अब शम्मा की पनाह मांगती है ,
सर्द पड़ी हुई हैं उम्मीद की हड्डियाँ आज,
कि रब की बंदगी भी अब गुनाह मांगती है !
-copyright belongs to Satbir Singh
नूर-ओ-सहर भी अब शम्मा की पनाह मांगती है ,
सर्द पड़ी हुई हैं उम्मीद की हड्डियाँ आज,
कि रब की बंदगी भी अब गुनाह मांगती है !
-copyright belongs to Satbir Singh
No comments:
Post a Comment